सारंगढ़

28 जनवरी 2026 को यूरिया गोल्ड की अधिसूचना जारी 40 केजी के भर्ती में मिलेगा यूरिया गोल्ड


सारंगढ//30 जनवरी 2026 को यूरिया गोल्ड की अधिसूचना जारी हुई है, यूरिया गोल्ड में 37% नाइट्रोजन तथा 17 % सल्फर उपलब्ध है | सल्फर की उपस्थिति के कारण यह यूरिया पीले रंग का होगा जिस कारण इसे यूरिया गोल्ड कहा गया है, किसान भाइयों को बताना चाहेंगे कि कृषि में फसल को अपनी जीवन चक्र पूरा करने के लिए 17 प्रकार के पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है | फसलो में इन पोषक तत्वों के उपयोग व आवश्यकता के आधार पर इन्हें मुख्य/प्राथमिक पोषक तत्व  – नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटेशियम, द्वितीय/गौण पोषक तत्व – कैल्शियम, मैग्नीशियम व सल्फर तथा सूक्ष्मपोषक तत्व – आयरन, मैगनीज, जिंक, कॉपर, बोरान, मोलिब्डेनम, क्लोरिन व निकेल इसके आलावा अन्य पोषक तत्व – कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन है, जो कि हमें हवा व पानी से मिल जाते है | उपरोक्त सभी पोषक तत्व फसलों के लिए अति आवश्यक होता है |


अभी हम यूरिया गोल्ड पर बात करेंगे इसमें उपलब्ध नाइट्रोजन पौधों की वानस्पतिक विकास के लिए आवश्यक है साथ ही सल्फर पोषक तत्व पौधों के विकास, प्रोटीन संश्लेषण, एंजाइमों को सक्रिय करने और क्लोरोफिल के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । यह तिलहनी फसलों में तेल की मात्रा और दालों में प्रोटीन की गुणवत्ता बढ़ाता है, साथ ही फफूंदनाशक (Fungicide) और माइटीसाइड के रूप में रोगों से फसल की रक्षा करता है कुछ फसले जैसे सरसों, मूँगफली, सोयाबीन, मिर्च, लहसुन ,प्याज की फसलो के अच्छी उत्पादन के लिए सल्फर अति आवश्यक है । हरित क्रांति के बाद से किसानों द्वारा फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए  N P K खादों का अधिकतम उपयोग किया जाता रहा है, जबकि सल्फर का उपयोग नहीं के बराबर होता रहा है | जिसका कारण मिट्टी में इसकी उपलब्धता कम हो गई है, सल्फर की कमी फसल उत्पादन के साथ-साथ फसलों में रोग कीटों को बढ़ावा देता है ।इसी कमी को दूर करने, संतुलित खाद का उपयोग बढ़ाने, फसल उत्पादन बढ़ाने, किसानों को खुशहाल बनाने यूरिया गोल्ड भारत सरकार की बहुत ही सराहनीय पहल है |

किसान भाइयों यूरिया amide फॉर्म में होता है जो खेतों में छिड़काव के बाद अमोनिकल फॉर्म में परिवर्तित हो जाता है | जिसे बहुत कम मात्रा ही पौधे ग्रहण कर सकते हैं उसके बाद यूरिया नाइट्रेट में परिवर्तित होता है, जिसे कोई भी फसल ग्रहण नहीं कर सकते हैं | जिस कारण 50-60 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस के रूप में एवं जल में घुलकर भूमि के नीचे चला जाता है, जो पौधों को उपलब्ध नही हो पाता | इसप्रकार 50-60 प्रतिशत नाइट्रोजन पौधे द्वारा बिना उपयोग किये ही नष्ट हो जाता है । नाइट्रोजन का पानी में घुलने के पश्चात वह  नाइट्रोसोमोंन में परिवर्तित हो जाता है जो कैंसर का मुख्य कारण है । भारत देश में सबसे ज्यादा यूरिया उपयोग करने वाले राज्य पंजाब , हरियाणा जहां सबसे ज्यादा कैंसर के मरीज हैं । WHO के रिपोर्ट के अनुसार पीने के पानी में अधिकतम 50 माइक्रोग्राम नाइट्रोजन होना चाहिए परंतु हमारे देश में 90 माइक्रोग्राम तक नाइट्रोजन पाया गया है, जो बहुत ही खतरनाक स्तर पर है और हमें इस समस्या से निदान अवश्य पाना है |

उप संचालक कृषि सारंगढ़ द्वारा अपील की है – किसान भाइयों हमें अपनी खेत की मिट्टी का जाँच कराकर फसलों में संतुलित और अनुशंसित खादों का उपयोग करना है, फसल अवशेष (पैरा/पराली) को नही जलाने एवं खेती में हरी खाद का उपयोग को बढ़ाने तथा ग्रीष्मकालीन में फसल चक्र के रूप में दलहन-तिलहन फसलों को अपनाना होगा |

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